लिपुलेख पर नेपाल को है दिशा और दृष्टि भ्रम, कहीं यहां भी तो नहीं चीन की नजर?

लिपुलेख पर नेपाल को है दिशा और दृष्टि भ्रम, कहीं यहां भी तो नहीं चीन की नजर?

लिपुलेख को लेकर नेपाल द्वारा खड़ा किया जा रहा ताजा विवाद नेपाल का केवल दिशाभ्रम और सुगोली की संधि की गलत व्याख्या का नतीजा बल्कि इसके पीछे चीन की एक और साजिश स्पष्ट नजर आ रही है। नेपाल का दिशाभ्रम यह कि वह जिस जलधारा को काली नदी बता रहा है वह पूर्वाेन्मुख होने के कारण उसमें संधि के अनुसार सीमा विभाजनकारी दिशाएं पूरब और पश्चिम नहीं बल्कि उत्तर और दक्षिण हैं।

संधि की गलत व्याख्या इसलिए की नेपाल असली काली नदी को नकार कर कूटी नदी को काली मान रहा है। हालांंकि चीन ने इसे भारत और नेपाल का आपसी मामला बताया है मगर चीन के इशारे पर नाचने का प्रमाण यह कि लिपुलेख का निर्जन और दुर्गम क्षेत्र नेपाल के किसी काम का नहीं बल्कि भारत और चीन के लिए अत्यंत सामरिक महत्व का है। जाहिर है कि चीन उत्तराखण्ड में भी एक और डोकलाम बनाना चाहता है। जबकि इसी राज्य के बाड़ाहोती में वह हर साल घुसपैठ करता रहता है। 

लिपुलेख दर्रे पर नेपाल का दावा पुराना
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा गत् 8 मई को घट्टाबगड़-लिपुलेख सड़क का उद्घाटन किए जाने के बाद से ही नेपाल में भारत विरोधी प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। इन प्रदर्शनों के दबाव में सोमवार को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल की कैबिनेट की बैठक में देश के नए नक्शे को मंजूरी दे दी गई जिसमें लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल में दिखाया गया है जबकि इलाके भारत में आते हैं।

यही नहीं नेपाल सरकार ने  अपने दार्चुला जिले के छांगरू में सीमा पर निगरानी के लिए नेपाल सशस्त्र प्रहरी की स्थाई चेकपोस्ट भी स्थापित कर दी। चेकपोस्ट के लिए जिस तरह हेलीकॉप्टर से सशस्त्र बल के जवानों को तैनात किया जा रहा है, उससे ही साबित हो जाता है कि यह क्षेत्र कितना दुर्गम और अलाभकारी है जिसमें नेपाल ने संचार सुविधाओं का विस्तार करना भी जरूरी नहीं समझा।

नेपाल का यह भी दावा है कि 1962 के युद्ध में भारतीय सेना ने इस क्षेत्र में अपनी चौकियां स्थापित कीं थीं और युद्ध के बाद बाकी चौकियां तो हटा दीं मगर लिपुलेख क्षेत्र से भारतीय सुरक्षा बल नहीं हटे। नेपाल ने इससे पहले साल 2019 के नवंबर में भी इस क्षेत्र को अपने नक्शे में दर्शाने पर भारत के समक्ष अपना विरोध जताया था।

उससे पहले वर्ष 2015 में जब चीन और भारत के बीच व्यापार और वाणिज्य समझौता हुआ था, तब भी नेपाल ने दोनों देशों के समक्ष आधिकारिक रूप से विरोध दर्ज कराया था।

इस निर्जन एवं दुर्गम क्षेत्र का सही ढंग से सीमांकन न होने के कारण भारतीय कूटनीतिकार इसे अधिकाधिक सुविधाएं पाने के लिए इसे नेपाल की प्रेशर टैक्टिस मानते रहे हैं। लेकिन अब धीरे-धीरे इस विवाद को हवा देने के पीछे चीन का हाथ साफ नजर आने लगा है।

May 20, 2020 21:32:15 - मे प्रकाशित

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