मुकदर्शीकी शिकायत

शक्तिका घडामे स्तुति और भर्ने लगा 
सभ्यताकी घडी-सुई चीख और करने लगा !
इमान-जमान सब ईकट्ठा जब मर्ने लगा 
तब, मेरा क्यानभास, भूत-ओं से नहीं, इन्सानसे ज्यादा डरने लगा !

हाय! ये खुली आँखका बन्द मुंह, सब लगें हैं मालिशमे 
हाय! ये बिना छन्दके स्वच्छन्द बूस्, सब भरे हैं बालिशमे 
सुनताहुँ, इन दिनो, भूत भी डरता है,
कार्यालयकी घुमती कुर्सीवालेसे
जिने देखके शरम भी शरम से भागताहै 
जिनका नेत्र और कान स्तुतिसे ही जागताहै !
मत करना ‘तर्क’की कोई साइड, दुसरी दिन तुमारी हो सकती सुसाइड (Suicide)
तुमे पता भी नही चलेगा, ये साधुबादकी सायानाइड
क्युं कि कुर्सीके आसपास, 
चल्ता रहेता कुछ खास 
मेण्डककों की इजलास 
कुछ रुरु सास, कुछ जिन्दा लाश !
जो हैं चक्षु होकरभी दृष्टिहीन
सुष्क हो होकर वृष्टिहीन 
ना लाज, ना आगाज़, मुर्दा शान्तिकी वो आवाज !
वोह भी सुस्त सुस्त बिखरने लगा !
तब, मेरा क्यानभास, भूत-ओं से नहीं, इन्सानसे ज्यादा डरने लगा !

हाँ मेरे क्यानभास !
तु तो प्रजा है ना ?
बस् देख सहर्ष, इमानकी बलात्कार 
पुजा कर्, शिरउपरके ये तलवार !
तु क्यानभास !
डालना है चेसकी सिपाहीकी येह जीवन 
बनाना है फिजुल मन और पानीके बुँद जैसे तन !
हाँ जी सिर्फ पानीकी बुँद !
किसीकी गर्माइसके बजहसे बनतेहैं भाप !
किसीके फुफु से पहुंचते आसमान !
किसीके भोंपू से नाचते हैं कानोकान !
थुक्ते हैं वो धर्ती जिसमे पहले खडे थे 
कहाँ याद! जब गर्माइसकी होगी लोडशेडिंग,
फिर गिरते हैं किसी दिन पानीके बुँद धर्तीमे नङ्गा,
फिर भी बिचारे चेस सिपाही 
हे झुण्ड! नाचता हुवा जोकर 
बडी बालिशके मालिशे नोकर !
उफ्! कली गली-गली भर्ने लगा 
शरम ही शरम के मारे मर्ने लगा 
तब, मेरा क्यानभास, भूत-ओं से नहीं, इन्सानसे ज्यादा डरने लगा !

जिर्णशीर्ण लज्जाके अन्दर झाँको तो सही,
तुमारी बचिखुची अस्तित्वका बद्वु अनुभूत होगी 
या खोचुके शीत-निद्रामे ध्राणशक्ति भी र ?
कोई दुसरेका कियाहुवा खडा 
कोई दुसरेका भरताहुवा घडा 
दौड़तेहो दौड़ानेवाले कोई और 
बोलते हो बुलवानेवाले कोई और 
प्रदक्षिना एवं दक्षिणाकि जुठी आसमान !
क्षणमे भाप, क्षणमे जलकी मान !
अहा निस्क्रिय रोबोट ! तोता पटाका !
हे भगवान् !
तुमारी दैवी न्यायकी शीत-निद्रामे 
किसी धुन मे ताकत चलगयी 
साधु भेष-अन्दर सायद कहीं साधुपन जलगयी
हाय इन्सान१ तेरी सभ्यता 
आसमान नीचे कहीं ढलगयी !
कोही मुहं नही खोल्ना 
क्युंकी सिंढीयाँ टुटजाता है 
कभी मत बोलना क्युंकी शब्दसे चुभता है 
साधुवोंकि गेरुरङ्गसे इन्सानी परदे चमकता है 
सचकी सपने कई दिशायें अनाथ ही सुलगता है 
हां जी !
कंक्रिटकी जंगलमे ज्यादा मकान, कम घर लगता है 
पहले भुतों से डरतेथे, 
अभी तो इन्सानों से ज्यादा डर लगता है !

शक्तिका घडामे स्तुति और भर्ने लगा 
सभ्यताकी घडी-सुई चीख और करने लगा
इमान-जमान सब ईकट्ठा जब मर्ने लगा 
तब, मेरा क्यानभास, भूत-ओं से नहीं, इन्सानसे ज्यादा डरने लगा !
 

प्रकाशित तारीख : 2020-07-13 11:37:40

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