चामुंडेश्वरी देवी से जुड़ा है मैसूर का दशहरा पर्व

दशहरा पर्व देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन मैसूर के दशहरा की अलग ही रौनक देखने को मिलती है। यहां दशहरा का पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, इसलिए मैसूर का दशहरा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। दशहरा या विजयादशमी के पर्व पर मैसूर का राज दरबार आम लोगों के लिए खोल दिया जाता है और फिर भव्य जुलूस निकलता है। मैसूर के दशहरे में न तो राम होते हैं और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। यहां यह पर्व मां भगवती के राक्षस महिषासुर का वध करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यहां दशहरा का आयोजन नवरात्रि के पहले दिन से ही शुरू हो जाता है।

चामुंडेश्वरी देवी की पूजा से होती है शुरुआत
कर्नाटक के शहर मैसूर में दशहरे का आयोजन दस दिन तक होता है और इस त्योहार में लाखों की तादात में पर्यटक शामिल होते हैं। इस दशहरा को स्थानीय भाषा में दसरा या नवाबबा कहते हैं। इस उत्सव की शुरुआत देवी चामुंडेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ शुरू होती है। चामुंडेश्वरी देवी की पहली पूजा शाही परिवार करता है। इस पर्व में मैसूर का शाही वोडेयार परिवार समेत पूरा मैसूर शहर शामिल होता है।

दुल्हन की तरह सजाया जाता है मैसूर पैलेस
मैसूर के दशहरे में 10 दिन तक खास लाइटिंग की जाती है। इस मौके पर कई तरह की प्रदर्शनियां निकलती हैं और कई तरह के धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। मैसूर पैलेस को जहां एक लाख से अधिक बल्ब के साथ खूबसूरत बनाया जाता है, वहीं चामुंडेश्वरी पहाडिय़ों को रोशनी के साथ प्रकाशमय किया जाता है। 14वीं शताब्दी में हुई थी शुरुआत इस साल मैसूर का भव्य त्योहार 408वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। इस मेले के इतिहास के बारे में बताया जाता है कि हरिहर और बुक्का नाम के दो भाइयों ने 14वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य में नवरात्रि का उत्सव मनाया था। इसके बाद 15वीं शताब्दी में राजा वोडेयार ने दस दिनों के मैसूर दशहरे उत्सव की शुरुआत की। कथा मिलती है कि यहां मौजूद चामुंडी पहाड़ी पर माता चामुंडा ने महिषासुर नामक राक्षस का अंत किया था और बुराई पर सत्य की जीत को बहाल किया। इसलिए मैसूर के लोग विजयादशमी या दशहरे को धूमधाम से मनाते हैं।

निकाली जाती हैं झांकियां
दशहरे के दिन यहां माता चामुंडेश्वरी की पूजा अर्चना की जाती है। इसके बाद खास जुलूस निकलता है, जो अंबा महल से शुरू होता है और मैसूर से होते हुए करीब पांच किमी. दूर तक जाता है। इस जुलूस में तकरीबन 15 हाथियों को शामिल किया जाता है और खूबसूरत तरीके से सजाया जाता है। उस जुलूस में नृत्य, संगती, सजे हुए जानवर आदि झांकियां निकाली जाती हैं।

माता निकलती हैं नगर भ्रमण पर
दसवें दिन मनाए जाने वाले उत्सव को जंबू सवारी के नाम से जाना जाता है और इसमें बच्चे बड़े सभी लोग शामिल होते हैं। साथ ही सोने चांदी से सजे हाथियों का काफिला निकलता है, जो 21 तोपों की सलामी के बाद मैसूर राजमहल से निकलता है। इस दिन सभी की निगाहें गजराज के सुनहरे आसन पर टिकी होती हैं। इसी आसन पर चामुंडेश्वरी देवी नगर भ्रमण के लिए निकलती हैं और उनके साथ अन्य गजराज भी निकलते हैं। साल भर में यही एक मौका होता है, जब देवी मां 750 किलो के सोने के सिंहासन पर विराजमान होकर नगर भ्रमण के लिए निकलती हैं।

प्रकाशित तारीख : 2023-10-27 18:33:00

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