नेपाल को कौन भड़का रहा है

नेपाल को कौन भड़का रहा है

महेंद्र वेद

समस्याएं-चाहे वे वास्तविक हों या काल्पनिक, नई हों या लंबे समय से उपेक्षित-जटिल हो जाती हैं, तो वे संकट का रूप धर लेती हैं। बयानबाजी करना या आरोप लगाना इनसे निपटने  का तरीका नहीं है। लेकिन भारत-नेपाल रिश्ते में नेपाल के रवैये को देखकर तो यही लगता है।

भारत को फिलहाल सिक्किम में चीनी सैनिकों के साथ टकराव या उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाके पर नेपाल के दावे से निपटने के बजाय कोरोना वायरस से निपटने पर ध्यान केंद्रित करना होगा, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करना होगा, प्रवासी कामगारों की सुरक्षित घर वापसी सुनिश्चित करने के बारे में सोचना होगा और महामारी से निपटने के लिए दुनिया के साथ जुड़ना होगा।

ऐसे ही, नेपाल को भी बड़े भाई के उकसावे पर भारत से उलझने के बजाय संवेदनशील घरेलू मुद्दों से निपटने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत ने तिब्बत में मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए छोटे रास्ते के तौर पर एक राजमार्ग का निर्माण किया है। नेपाल का कहना है कि यह सड़क उसके इलाके से गुजरती है।

सिर्फ लिपुलेख और कालापानी ही नहीं, बल्कि काठमांडू की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे लोगों ने भारत-नेपाल के बीच अन्य विवादित क्षेत्रों का भी हवाला दिया है। इस मुद्दे ने नेपाल के भीतर भारत-विरोधी प्रदर्शनों को तेज कर दिया है। वहां के अखबारों में इससे संबंधित खबरें भरी पड़ी हैं और हिमालयी राष्ट्र में सभी पक्षों द्वारा भारत की तीखी आलोचना की गई है, जिनमें नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल है।

भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है, लेकिन नेपाल में कुछ अतिवादियों ने सीमा पर घेरेबंदी का सुझाव दे डाला है। दोनों देश औपचारिक तौर पर कहते हैं कि वे बात करने के लिए तैयार हैं, पर किसी भी पक्ष ने इसकी तारीख तय नहीं की है।

काफी दिनों तक बचे रहने के बाद अंततः नेपाल में भी कोरोना के 357 पॉजिटिव मामले सामने आए, और दो की मौत हो गई। नेपाल इसके लिए भी भारत को दोषी ठहराया। मई के अंत में उसने कपिलवस्तु जिले की सीमा  सील कर दी। यही नहीं, प्रधानमंत्री के पी ओली ने नेपाल में फैलते संक्रमण के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया और संसद में कहा कि 'भारत की स्थिति चीन और इटली से भी खतरनाक लगती है।'

ओली ने 'गैरकानूनी तरीके से भारत से आने वाले' स्थानीय प्रतिनिधियों को वायरस फैलाने का जिम्मेदार ठहराया है। और इस तरह उन्होंने घरेलू मुद्दे को भी लपेट लिया। दरअसल काठमांडु कभी भी उन मधेशियों के प्रति सहज नहीं रहा है, जो सीमावर्ती इलाकों में रहते हैं।

May 23, 2020 08:53:41 - मे प्रकाशित

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