चीनी सम्राज्यवाद को हल्के में न लें !

चीनी सम्राज्यवाद को हल्के में न लें !

By - Dhirendar Nath

१. मैने साम्राज्यवादी चीनियों को अवसर मिलते ही जूते से मारने की बात यूँ ही नहीं कही थी...
२. देश से प्रेम करने के लिए अबुद्धिजीवी/मंदबुद्धि होना अनिवार्य नहीं है ।

चीन तिब्बत ही नहीं नेपाल को भी अपने चपेट में ले लेगा । भारत को उससे सतर्क रहने की ज़रूरत है । चीन और अमेरिका की फ़ितरत एक जैसी ही है । जिस देश के निकट हुए उसको अपने वर्चस्व के अधीन रख, कमज़ोर और पिछलग्गू बना कर विश्व से अलग-थलग कर देते हैं । देखिए नेपाल की स्थिति । और अमेरिका की गोद में पले पाकिस्तान की स्थिति ।

अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि कुछ चमगादड़ दिन रात अपने ही देश के नागरिकों और बुद्धिजीवियों को *विदेशभक्त* साबित करने में मशगूल रहते हैं । उन्हें नहीं मालूम कि दुनिया के किसी भी देश के इतिहास में उस देश के दार्शनिकों, विचारकों, कवियों और बुद्धिजीवियों के देशप्रेम के विरुद्ध एक भी पन्ना नहीं मिलता । किसी राष्ट्र का गौरव उस देश के बुद्धिजीवी ही होते हैं । भारतीय स्वाधीनता संग्राम का भी एक बड़ा हिस्सा इंटेलेक्चुअल-डिस्कोर्स का ही रहा है । दो विश्वयुद्धों के बीच यहाँ हिंसा और अहिंसा का विश्वव्यापी डिस्कोर्स चल रहा था । सहमति असहमति आपनी जगह है । इसके साथ ही जो तबका स्वतंत्रता के हथियारबंद संघर्ष में उतरा, मसलन भगतसिंह तथा उनके साथी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस , ये भी अपने समय के जाने-माने इंटेलेक्चुअल्स ही थे । राममोहन राय, विवेकानंद, गाँधी, टैगोर, फुले, अंबेडकर, नेहरू, सरोजिनी नायडू, प्रेमचन्द, निराला, इक़बाल, सर सैयद, अरविन्द वगैरह उनदिनों विश्व के उच्चकोटि के विचारकों और बुद्धिजीवियों में शुमार थे । इसलिए बुद्धिजीवियों को रोज़ नई गाली देने की जगह उनसे संवादरत होने की ज़रूरत है ।

देशाभिमानियों, याद रहे (बल्कि कान खोल कर सुन लेँ) एक राष्ट्र विश्व में सिर्फ़ उतना ही सम्मान अर्जित कर सकता है जितना सम्मान वह अपने बुद्धिजीवियों को देना गवारा करता है ।

आप जानते हैं कि एक बहुत ताकतवर और साहसी आदमी भी यदि बुद्धिहीन है तो वह किसी जटिल परिस्थिति में पड़ जाने, किसी संकट से घिर जाने पर अपने बल और साहस का समुचित उपयोग नहीं कर पाएगा ।

भारतीय मेधा और प्रतिभा का लोहा विश्व सदा से मानता आया है। यह देश दर्शन की जन्मभूमि है । चीन और एशिया के कई देश अतीत में भारत की दार्शनिक परंपरा से अभिभूत हुए, बौद्धमत के अनुगामी हुए । चीनादि देश भारत के शिष्य रहे हैं । भारतीय विचारकों को दुनिया सम्मान से देखती आई है । आश्चर्यजनक है कि आज कुछ मंदबुद्धि /अबुद्धिजीवी/ अधपढ़े अपने ही देश के बुद्धिजीवियों को सोशल मीडिया पर चिढ़ाते, उनके प्रति नफ़रत फैलाते मिल जाएँगे उन्हें कुछ पढ़ना-लिखना चाहिए । उनकी इन हरकतों से बुद्धिजीवियों का कुछ नहीं बिगड़ता ख़ुद उनका ही जीवन व्यर्थ बीतता है । दुनिया में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और ईरान यही दो चार देश हैं जहाँ बुद्धिजीवियों को तिरस्कृत करने का चलन है । आप यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका, जापान, आस्ट्रेलिया में जा कर देखिए । फ्राँस और पूरा यूरोप अपने इंटेलेक्चुअल्स को अपने मस्तक पर रखता है ।

चीन के लिए भी असली चुनौती यहाँ के विचारक, वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी ही हैं । हथियार और रणनीति आजकल सबके पास होती है । जो चीज़ मायने रखती है वो है किसी देश की मेधा । उसका सम्मान करना सीखिए । और याद रखिए इस सम्मान की ज़रूरत देश के कवियों दार्शनिकों और विचारकों को नहीं होती बल्कि ख़ुद उस देश को होती है कि उसके पास ऐसे विचारक और बुद्धिजीवी हैं । जिनका सम्मान कर के वह विश्व में सम्मान पाता है ।

Jun 23, 2020 07:55:04 - मे प्रकाशित

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