स्मृति के चलचित्र : (गन्ना) 

आज के 30 वर्ष पूर्व की बात बता रहा हूँ । 
गाँवों में इस समय गन्ने की कटाई चालू हो जाती थी । 
खेत में लगे गन्ने को हम लोग जब मर्जी चाहे तोड़ लेते थे । सबसे मोटे गन्ने को निशाना बनाया जाता था और हम लोग उस पर लटक जाते थे । तड़ाक की आवाज से गन्ना टूट जाता था तो वह हमारी विजय का प्रतीक होती थी । 

गन्ने की पेराई चालू रहती थी । पूरे आसपास के गाँवों में एकमात्र हमारे पास ही गन्ने की पेराई की मशीन होती थी । आसपास के सभी लोग अपने गन्ने की पेराई के लिए आते थे । मेरे दादा जी जिन्हें हम "बब्बा" कहते थे वह मशीन के पास ही लगे रहते थे । 
हम बच्चे भी एक एक गन्ना पेराई मशीन में डालकर उससे रस निकलते देख कर बहुत खुश होते थे । 
ग्लास भर भर कर नींबू आंवला डाल डाल कर गन्ने का रस पीया जाता था । 

खाना खाने की सुध नहीं रहती थी । 

एक बहुत बड़ा कड़ाहा चढ़ता था जिसमें रस पकाया जाता था गुड़ बनाने के लिए।  वह रस उबलता रहता था । तब का याद है कि 11 से 15 उबाल होना अच्छे गुड़ बनने के लिए आवश्यक होता था । इससे ज्यादा उबाल अगर हुआ तो गुड़ खराब हो जाता था या उसकी quality बेकार हो जाती थी । 
रस पक गया है यह देखने के लिए एक उपाय किया जाता था । दूब की घास का गोल सा बनाया जाता था और उसको कड़ाहे में डाला जाता था । अगर उस गोल से बने हुए दूब की घास के डंठल में बुलबुले निकलें या फूँक मारने पर उस गोले में से bubbles निकलें तो रस पक गया है समझा जाता था । 

पूरे गाँव में कई कई किलोमीटर तक पकते हुए रस या गुड़ की महक भर जाती थी । 

हम लोग नई नई आलू लेकर उसमें cycle की तिल्ली या बाँस की पतली फाड़ लेकर उसको आलुओं के अंदर  घुसेड़कर उबलते हुए रस के कड़ाहे में डाल देते थे जिससे मात्र 5 मिनट में रसीला आलू तैयार हो जाता था । 
आलू , शकरकंदी को हम लोग ऐसे ही पकाते थे । 

फिर चने की साग ( जो पहले बहुत खट्टा हुआ करता था और बहुत स्वादिष्ट हुआ करता था । आज की तरह नहीं कि जैसे घास खा रहे हों ) को हरे लहसुन की पत्ती,  धनिया और मिर्च की चटनी के साथ खाते थे । 

वह गाँव का आनंद अब भी बहुत याद आता है । 
गुड़ के गुड़ भर भरकर निकलते थे।  हौदा में गुड़ रखा जाता था जो मिट्टी और पीतल का बना रहता था । 

होरहा भी बनता था । होरहा बोलते हैं हरे हरे चने की बालियों को भून दिया जाता था और चटनी से खाया जाता था । ऐसे ही हाबुस बनता था जिसमें हरे गेहूँ की नई बालियों को भून कर चटनी के साथ खाया जाता था । 

पर आज सब ख़त्म सा हो गया है । 

क्या हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए मात्र यह कहानी किस्सों तक ही सीमित रह जायेगा ?? 

हरिद्वार से वापस दिल्ली सफ़र के दौरान मुजफ्फरनगर से गुज़र रहा था और वहाँ खेतों में खड़े गन्नों से सब कुछ याद सा आ गया । 

ग़ज़ब के दिन थे वह !

प्रकाशित तारीख : 2020-03-05 03:50:17

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