साहित्य

‘जिंदगीका सफर है, ये मौत कि डगर’ 

  • Sep 07, 2020

ये कैसी घडी है ये कैसा असर है सदमे में है लोग वीरांन शहर है फिजा में भरी ये कैसा जहर है खौफ से सिमटा हुआ सारा दहर है जोशो न जुनुं है मायुश दिलों मे धसा डरका खंजर है जिंदगी बेजान सी है हर तरफ बस मौतका मंजर है मौत भि ऐसी न जनाजा निकले न मय्यत पे कोइ अश्क बहाए आग

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वैश्विक सांस्कृतिक साम्राज्य के आगे दम तोड़ती पत्र-पत्रिकाएं।

  • Aug 30, 2020

सुमन्त बच्चों की एक बड़ी पुरानी और लोकप्रिय पत्रिका नंदन तथा बड़ों की कादंबनी बंद हो गयीं। इसके बहुत पहले इनसे भी अधिक लोकप्रिय और अत्यधिक बिक्री वाली हिंदी की ढेरों पत्र-पत्रिकाएं बंद हुई हैं। मुझे नहीं लगता कि हिंदी की जिन लोकप्रिय पत्रिकाओं को बंद किया गया है, वे न बिकने या आर्थ

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मेरी तम्मना !

  • Aug 15, 2020

ये जो दिखाते है झूठा प्यार करते क्यों तेरे पीछे वार? जात- धर्म का नकाब ओढ़ के तेरी ही क्यों आंखें फोड़ते धर्म निरपेक्षता के नाम पर माँ असहनशिलता हैं फैलते इधर तेरी बेटी रो रही उधर तेरा बेटा मर रहा तुझे नोच नोच कर शत्रु तेरी आजादी पिता रहा ऐसे में ,मैं माँ हो

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नहीं रहे मशहूर शायर राहत इंदौरी, कोरोना से हुई मौत

  • Aug 11, 2020

उर्दू के मशहूर शायर राहत इंदौरी का आज दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 70 वर्ष के थे. कल ही उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी, जिसके बाद उन्हें 10 अगस्त को इंदौर के अरबिंदो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां उन्होंने अंतिम सांस ली।  आज रात 9.30 बजे सुपुर्दे खाक किया जाएगा। कोरोना पॉजिटिव होन

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हम सिर्फ याद रखसकते हैं

  • Jul 17, 2020

बहुरुपी हम याद ही तो रखसकते हैं छुपके कहीं मनोबादमे बहसकते हैं । हम ‘आजाद’ भी कहसकते हैं । कई दिलाशाके ललिपपमे बे-उन्माद मरसकते हैं । अस्त्र गुमाके वस्त्रहीन बादशाहकी बिगुल शंखनाद करसकते हैं । मुट्ठी सास,प्यालाभर भोजनके सहारे उनका भजन गा

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ग्रीष्म काल के ताप से, हुए सभी बेहाल !

  • Jul 16, 2020

बरस रहा अंगार है, अम्बर से दिन रैन ! बरसेगी जलधार कब ? आस लगाए नैन !! सूख कूप पोखर गए, गए सूख नद नाल ! ग्रीष्म काल के ताप से, हुए सभी बेहाल !! कृषक मेघ की आस में, इकटक रहे निहार ! उमड़ घुमड़ कर मेघ कब, छाएंगे इस पार !! तकि तकि मारत बाण है, सूर्य निरंतर ताप ! घायल पृथ्वी

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मुकदर्शीकी शिकायत

  • Jul 13, 2020

शक्तिका घडामे स्तुति और भर्ने लगा  सभ्यताकी घडी-सुई चीख और करने लगा ! इमान-जमान सब ईकट्ठा जब मर्ने लगा  तब, मेरा क्यानभास, भूत-ओं से नहीं, इन्सानसे ज्यादा डरने लगा ! हाय! ये खुली आँखका बन्द मुंह, सब लगें हैं मालिशमे  हाय! ये बिना छन्दके स्वच्छन्द बूस्, सब भरे

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मुझे मौत बुलाने आई थी !

  • Jul 12, 2020

आज रात स्वपन में मुझको मौत बुलाने आई थी। आदर और सत्कार सहित मुझे ले जाने आई थी।। आकर कहन लगी मुझको, करो तैयारी चलने की। अटल समय मृत्यु का होता, घड़ी नही ये टलने की।। कुछ पल बाकि बचे तुम्हारे तुमे जताने आई थी। आज रात स्वपन में मुझको मौत बुलाने आई थी।। हाथ जोड़क

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“साक्षात्कार- राजीव कुमार झा की कथाकार ममता शर्मा से बातचीत”

  • Jun 23, 2020

नासिक, महाराष्ट्र मेरी जन्मस्थली है। नासिक की स्मृतियां मेरे पास नहीं है। पिता फ़ौज में थे और देवलाली में पोस्टेड थे। उनकी बदली हुई और हम रांची आ गए। पढ़ाई लिखाई रांची में हुई। मेरे लिए लेखन हमेशा घर लौटने जैसा होता है। कुछ ऐसा कि आप घूमते रहें घर से बाहर; कभी यहां, कभी वहां, कभी सुबह निकल कर शाम को लौटें, क

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